क्यों सोशल मीडिया को अब संदेह भरी निगाहों से देखा जाने लगा है

सोशल मीडिया एप्स । प्रतीकात्मक तस्वीर | पिक्साबे


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सूचना के विभिन्न स्रोतों ने समय-समय पर मानव की स्मृति को विस्तार देने का काम किया है. इसी कड़ी में सोशल मीडिया या न्यू मीडिया एक विशेष भूमिका के साथ यूजर्स से संवाद स्थापित कर रहा है. लगभग एक दशक से भी ज्यादा उम्र होने के बाद सोशल मीडिया ने अपनी व्यापकता और पहुंच का लगातार विस्तार किया है और अब ये दुनियाभर में एक ऐसा उपकरण हो चुका है जिससे पीछा छुड़ाना बेहद मुश्किल बात लगती है.

सोशल मीडिया जिन आकांक्षाओं, उम्मीदों, संवाद को विस्तार और उसे अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लक्ष्य से हमारे बीच आया अब वही नज़रिया एकदम बदलता नज़र आ रहा है. अब सोशल मीडिया को हरदम संदेह भरी निगाहों से देखा जाने लगा है. लोकतंत्र से इसके संबंध पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं, संवाद की जिस दोतरफा उम्मीदों को इसने शुरुआत में जगाया था अब वही एकरस सी होने लगी है. यानि सोशल मीडिया के आने की जो खुशी दुनियाभर ने एक समय मनाई थी, वही अब कई देशों में मुसीबत का सबब बनने लगी हैं.

सोशल मीडिया की बढ़ती व्यापकता दुनियाभर के सामने कई चुनौतियां पेश कर रही हैं. इसमें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तौर से जुड़े मुद्दे शामिल हैं और यह अब तमाम क्षेत्रों में उथल-पुथल का कारण बनने लगी हैं.

सोशल मीडिया के कई पहलुओं और इसकी बनावट को समझाते हुए हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और भारतीय सूचना सेवा की अधिकारी गीता यादव ने एक बेहद जरूरी विषय पर विस्तार से काम किया है और उसे एक किताब की शक्ल दी है. लेखक ने ‘अन सोशल नेटवर्क ‘ किताब के जरिए भारत के विशिष्ट संदर्भों में सोशल मीडिया का सम्यक आकलन किया है.

अन सोशल नेटवर्क किताब में दिलीप मंडल और गीता यादव ने सोशल मीडिया के किन-किन पहलुओं और उससे उभरते खतरों का संकेत दिया है, इस पर दिप्रिंट एक नज़र डाल रहा है.

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