विशेषांकः खुशी का  ज्ञान-विज्ञान – The Science of Happiness

खुशी की खोज/विशेषज्ञों की राय

डॉ. निमेश देसाई 
डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहैवियर ऐंड एलाइड साइंसेज, दिल्ली

डॉ. रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर 
मनोवैज्ञानिक तथा मैनेजिंग डायरेक्टर, पॉजिटिव एक्रान, पोर्टलैंड, अमेरिका

प्रो. कमलेश सिंह 
डिपार्टमेंट ऑफ ह्युमानिटीज ऐंड सोशल साइंसेज, आइआइटी-दिल्ली

डॉ. श्याम भट 
डायरेक्टर, लिवलॉफलव फाउंडेशन, मुंबई (दीपिका पादुकोण द्वारा स्थापित)

प्र खुशी या आनंद को कैसे परिभाषित करेंगे?

➽ निमेश देसाई 
खुशी को अक्सर चिंताओं और नकारात्मक भावनाओं से मुक्त मनोदशा के रूप में देखा जाता है. ठीक-ठीक कहें तो यह मन की अनेक भावनात्मक अवस्थाओं में से एक है, जिनमें उदासी, दुश्चिंता, डर वगैरह भी आते हैं. समय के साथ जब उदासी और पीड़ा सरीखी मनोदशाएं ज्यादा रहने लगीं, तो सार्वजनिक विमर्श में खुशी या प्रसन्नता शब्द का इस्तेमाल ज्यादा व्यापक अर्थ में और समग्र सकारात्मक मनोदशाओं को समाहित करते हुए किया जाने लगा.

अलबत्ता इसे शाब्दिक अर्थ में देखने की गलती से बचने के लिए समझना जरूरी है कि खुशी शब्द का उपयोग किस संदर्भ में किया गया है. किसी के लिए भी लगातार खुश रहना बहुत असामान्य बात होगी, खासकर जब उसका कोई आधार न हो. वांछित लक्ष्य ऐसी मनोदशा हासिल करना होना चाहिए जिसमें नकारात्मक के बजाए सकारात्मक तत्व ज्यादा हों.

खुशी की इस विकसित होती अवधारणा के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलू हैं. मसलन, पश्चिमी जगत में व्यक्तियों को खुश रहने की ख्वाहिश पालने और उसके लिए जतन करने को प्रोत्साहित किया जाता है. मगर चिंता इस बात को लेकर है कि साधन-संपन्न लोग खुश हैं या नहीं. इसके उलट, कई पूरबी संस्कृतियां अस्तित्व की उपयोगिता और सार्थकता के साथ संतोष या संतुष्टि प्राप्त करने की दिशा में व्यक्ति को प्रोत्साहित करती हैं.

 ➽ कमलेश सिंह 
आज तक खुशी की कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं है. सैद्धांतिक तौर पर अलग-अलग व्याख्याएं हैं. मसलन, हेडोनिक या सुखवादी और यूडेमोनिक नजरिए इसकी संकल्पना करने का एक तरीका सुझाते हैं. हेडोनिक नजरिए में खुशी को सुख, सुविधा, आनंद के बराबर माना गया है. यूडेमोनिक नजरिया खुशी को सार्थक जीवन के बराबर मानता है, यह आत्म-स्वीकृति, व्यक्तिमगत विकास, सौद्देश्य जीवन, सकारात्मक संबंधों, पर्यावरण प्रवीणता और स्वायत्तता का सिद्धांत है.

कुछ पूर्वी मॉडल में खुशी/कुशल-क्षेम को मन की शांति और अंदरूनी तालमेल से जोड़कर देखा जाता है. इसी तरह, हमारे यहां खुशी का भारतीय नजरिया भी है, जैसे सत-चित्त-आनंद, जो आनंदमय मानसिक अवस्था की ओर ले जाता है. सैद्धांतिक नजरियों के अलावा इसकी परिभाषा का एक और तरीका इसे आम लोगों के विचारों से समझना है. हमारी रिसर्च से पता चलता है कि खुशी के बारे में लोगों के विचार के कई हिस्से हैं, चाहे वह सकारात्मक भावनाएं (आनंद, अंदरूनी शांति, वगैरह) हों या जीवन संतोष, स्वस्थ पारिवारिक रिश्ते, काम और उपलब्धि, या फुरसत के शगल.

 ➽ रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर 
खुशी एक मनोवैज्ञानिक अवस्था के कई अलग-अलग पहलुओं के लिए सामान्य शब्द है. कुछ तो यह आनंद जैसे सुखद एहसासों का अनुभव है. हालांकि यह पूरी तरह एहसास नहीं है. खुशी में अनुकूल नजरिया (आशावाद) और जीवन के अच्छे-भले चल रहे होने का बोध (संतोष) भी शामिल है. विभिन्न संस्कृतियों के लोग खुशी या खुशहाली के एक या दूसरे पहलू को अलग-अलग अहमियत देते हैं. कुछ संस्कृतियां शांति की भावना को बेशकीमती समझती हैं, जबकि दूसरी संस्कृतियां जोशोखरोश या उत्साह को अधिक महत्व दे सकती हैं. लिहाजा, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सत्य पर किसी एक समूह का एकाधिकार हो. हर विशिष्ट सांस्कृतिक झुकाव के अपने फायदे हैं.

 ➽ डॉ. श्याम भट 
खुशी की कोई सार्वभौमक परिभाषा नहीं है, पर इसे उस भावनात्मक अवस्था के रूप में सोचा जा सकता है जिसे ज्यादातर लोग चाहते हैं, ऐसी अवस्था जिसमें वे सकारात्मक और सुकून का अनुभव करते हैं. पश्चिमी संस्कृति और खासकर अमेरिकी संस्कृति खुशी की तलाश को जीवन का सबसे अहम लक्ष्य मानती है. प्राचीन भारतीय संस्कृति सहित पूरब में, लक्ष्य खुशी नहीं बल्कि मोक्ष था, वह अवस्था जहां दुख-दर्द, पीड़ा का चक्र खत्म हो जाता है.

दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा, ”खुद से पूछो कि क्या तुम खुश हो और तुम ऐसे (खुश) नहीं रहोगे.’’ विडंबना यह है कि जैसे-जैसे समाज अमेरिकी आदर्श को गले लगाकर व्यक्तिगत खुशी की तलाश करने लगा, अवसाद, दुश्चिंता और आत्महत्या की दरें बढ़ती गईं. खुशी की तलाश ने उपभोक्ता संस्कृति को आगे बढ़ाया. खुशी को अक्सर गलती से सुख मान लिया जाता है.

जैविक क्रमविकास और जीववैज्ञानिक नजरिए से सुख तब महसूस होता है जब किसी काम या पदार्थ की वजह से मस्तिष्क में डोपामाइन सरीखे न्यूरोकेमिकल का स्राव होता है. मगर विज्ञान और जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि सुख टिकता नहीं है. नयापन खत्म हो जाता है, मस्तिष्क उतनी ही तादाद में डोपामाइन नहीं बनाता और वह व्यक्ति नए अनुभवों की तलाश के लिए मजबूर हो जाता है. सुख स्वभाव से ही क्षणभंगुर है, जबकि खुशी या प्रसन्नता सूक्ष्म और टिकाऊ मानसिक अवस्था है. सुख की तलाश करने वालों को बस क्षणिक आनंद मिलता है और वे फिर असंतुष्ट होने लगते हैं.

किसी व्यक्ति के लिए खासकर बिना किसी वजह के हमेशा और लगातार खुश रहना मुमकिन नहीं हो सकता. वांछित लक्ष्य ऐसी मनोदशा हासिल करना होना चाहिए जिसमें नकारात्मक के बजाए सकारात्मक तत्व हर हाल में ज्यादा हों

डॉ. निमेश देसाई

प्र. हमारी खुशी की या उसे प्रभावित करने वाली खास वजहें क्या हैं?

➽ निमेश देसाई 
पहली बुनियादी वजह किसी व्यक्ति या समूह या समुदाय के लिए कुछ बुनियादी जरूरतों का पूरा होना है, जो जीवन में खुशी या संतुष्टि के लिए अनिवार्य हैं. इस तथ्य से यह सचाई भुलाई नहीं जा सकती है कि कुछ लोग या समुदाय का कोई समूह बिल्कुल प्रतिकूल परिस्थितियों या भारी किल्लत के हालात में भी खुशी या संतुष्टि पा लेने की कूव्वत रख सकते हैं. इसलिए हर स्तर पर इस सचाई का एहसास और स्वीकृति जरूरी है कि खुशी सिर्फ बुनियादी सुकून के पायदान पर ही आ सकती है.

इसके अलावा, खास स्वास्थ्य संबंधी या सामाजिक समस्या के न होने से भी खुशी की अवस्था हासिल करने में मदद मिल सकती है. जिंदगी के किसी क्षेत्र में सकारात्मक नतीजों से भी ऐसा हो सकता है लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि उससे कोई खुश हो जाए. यकीनन, यह भी देखा गया है कि वाजिब वजहों के न होने या मुश्किल हालात या बिल्कुल प्रतिकूत परिस्थितियों में भी कई लोगों और संस्कृतियों में सकारात्मक बने रहने या खुश रहने की फितरत होती है, जिसे धैर्य या लचीलापन भी कहते हैं.

यही नहीं, अलग-अलग सांस्कृतिक उप-समूहों में मुश्किल हालात को झेल लेने और सकारात्मक बने रहने की क्षमता अलग-अलग ढंग से होती है, ताकि समस्या या संकट का वाजिब हल निकाला जा सके. व्यक्तियों में भी यह लचीलापन अलग-अलग होता है. इस लचीलेपन के साथ जिंदगी में खुशी या संतुष्टि के भाव में आपकी बुनियादी फितरत का भी योगदान होता है. मसलन, आकांक्षाओं और असलियत के बीच संतुलन, व्यक्ति की अपनी चेतना का स्तर, समाज तथा परिवार की मदद, और प्रासंगिक समूहों तथा व्यक्तियों से भावनात्मक लगाव, बशर्तें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं न पैदा हों. 

अमूमन अवसाद, बेचैनी, दौरे पडऩा और शराब जैसी नशे की लत की परेशानियां, जिसकी पहचान अब जेनेटिक और शारीरिक जरूरत की तरह की जाने लगी है, जैसी मानसिक बीमारियों को गिना ही नहीं जाता और निश्चित रूप से उसकी उपेक्षा की जाती है. इसके अलावा, व्यक्तिगत और आपसी आचार-व्यवहार की समस्याएं भी काफी परेशानी पैदा करती हैं और खुशी की राह में रोड़ अटकाती हैं. राजनैतिक और आर्थिक हालात भी काफी अहम भूमिकाएं निभाते हैं. उसी तरह आर्थिक और आध्यात्मिक परंपराओं का भी योगदान होता है.

 ➽ कमलेश सिंह 
पहले तो मैं यही कहूंगी कि हमारी सोच की भूमिका बेहद खास है. उससे ही हमारा भावनात्मक संसार बनता है, जो नकारात्मक और सकारात्मक भावनाओं में उनकी प्रकृति के अनुरूप तेजी ला सकता है. दूसरे, हमारा तौर-तरीका और क्रियाकलाप भी उतना ही अहम होता है. मसलन, आभार प्रकट करने, माफ कर देने और दूसरों की मदद करने से आपको खुशी हो सकती है. इसलिए हमारी सोच, भावनाएं और तौर-तरीके अहम हैं और उतनी ही अहम बाहरी वजहें हैं. मसलन, काम या पढ़ाई का दबाव, अन्याय, अस्वस्थकर रिश्ते या हमारे आसपास हाने वाली दूसरी घटनाएं हमारी खुशी की अवस्था में काफी असर डालती हैं. इस तरह खुद से जुड़ी वजहों के साथ बाहरी वजहें भी हमारी खुशी में अहम भूमिका निभाती हैं.

 ➽ रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर 
खुशी का अगर कोई इकलौता ‘राज’ है, तो वह सामाजिक रिश्तों में ही पाया जाता है. दुनिया में कोई चाहे जहां रहे, रिश्तों का असर उसकी खुशी पर सबसे ज्यादा पड़ता है. साथ-साथ वक्त बिताना, मदद हासिल करना और सामाजिक योगदान करना खुशी के सबसे अहम मामले हो सकते हैं.

 ➽ डॉ. श्याम भट 
खुशी या खुशहाली सीधे या अपने आप नहीं हासिल की जा सकती. न ही खुशी दुख या दर्द का न होना है, क्योंकि जिंदगी में दुख भी अनिवार्य रूप से जुड़े हुए होते हैं. इसके विपरीत, खुशी किसी की काबिलियत के खिलने और उसकी आजादी में है, जो तमाम दुश्चिंताओं और गैर-जरूरी डर से मुक्ति पा कर किसी खास मकसद के लिए जीता है, अपने से बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित होता है, हंसी-खुशी के लम्हों के साथ जिंदगी के मकसद, उसकी सार्थकता और जुड़ाव का एहसास करता है.

हमारी सोच, भावनाएं और तौर-तरीके खुशी पर असर डालते हैं और उतनी ही अहम बाहरी वजहें होती हैं. मसलन, काम या पढ़ाई का दबाव, अन्याय, खराब रिश्ते या हमारे आसपास होने वाली दूसरी घटनाएं
कमलेश सिंह

प्र खुशी क्या दिमागी फितूर है? क्या हम दिमाग को खुश रहना सिखा सकते हैं?

➽ निमेश देसाई 
हालांकि ‘माइंड गेम’ या दिमागी खेल शब्द के कई भिन्न-भिन्न निहितार्थ हो सकते हैं, पर हमारी मानसिक सेहत या मनोवैज्ञानिक कुशल-क्षेम की अवस्था में मन-मस्तिष्क की भूमिका बेहद अहम है. अलग-अलग व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न मनोदशाओं से प्रभावित होने की बुनियादी प्रवृत्ति के लिहाज से ही नहीं, बल्कि उतना ही इस लिहाज से भी कि वह व्यक्ति अपने स्वभावगत रुझानों और प्रवृत्तियों में निश्चय ही सुधार ला सकता है.

उत्साहवर्धक तथ्य यह है कि भावनात्मक सेहत सहित मनोवैज्ञानिक और मानसिक प्रक्रियाएं मस्तिष्क के तंत्रों के जरिए काम करती हैं और उन्हें खुद अपनी कोशिश से साधा और बदला जा सकता है. असहायता का एहसास उचित नहीं होगा, क्योंकि खुशी (या मेरी समझ से, जीवन में संतोष) व्यक्ति के खुद को ढालने के बेहद अहम सूक्ष्म तत्व के अलावा आर्थिख परिवेश और सामाजिक-प्रौद्योगिकीय विकास के वृहत वातावरण और उसके साथ ही पेशेगत या सामाजिक सफलता और भौतिक सुख-सुविधाओं को हासिल कर पाने की स्थिति पर निर्भर है.

 ➽ कमलेश सिंह 
पिछले वर्षों के दौरान हमने देखा कि खुश रहने की कोशिशों से हमारी खुशी का स्तर वाकई बढ़ जाता है. ऐसे अध्ययन बताते हैं कि आपकी खुशी का स्तर अपने जरिए बढ़ाना संभव है. इसलिए मैं कहूंगी कि हां, हम अपने दिमाग को एक निश्चित हद तक खुश रहना सिखा सकते हैं.

 ➽ रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर 
कुछ लोग कहते हैं कि ”खुशी मनोदशा है.’’ यह अति-सरलीकरण हो सकता है, क्योंकि जीवन की अनुकूल परिस्थितियां खुशी में मददगार होती हैं. अलबत्ता जीवन के मुश्किल हालात के बावजूद लोग खुश हो सकते हैं. मसलन, झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों पर हुए शोध और अध्ययन से पता चलता है कि उन्हें दुश्चिंताएं घेरे रहती हैं, उसके बावजूद वे अपनी जिंदगी के कई पहलुओं (सब नहीं) से संतुष्ट भी होते हैं. जिंदगी में जो कुछ अच्छा-भला चल रहा है, लोग उसकी सराहना करना और उसका आनंद लेना सीख सकते हैं. ऐसा होते हुए भी हमें अपने हालात में सुधार लाने, बेहतर सुरक्षा पाने और अन्याय से निपटने के लिए काम करना चाहिए.

 ➽ डॉ. श्याम भट 
व्यक्ति की खुशी का स्तर कई वजहों से तय होता है. व्यक्ति का मिजाज, जो उसके जींस से प्रभावित होता है, खुशी के स्तर में अहम भूमिका निभाता है. हम अपने जींस नहीं बदल सकते, पर कई दूसरी बदलने वाली चीजें बदल सकते हैं, जो खुशी का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ा सकती हैं. उपलद्ब्रध सबूत इन बातों की ओर इशारा करते हैं:

1) शारीरिक सेहत का खुशी से सीधा संबंध है. जो जितना स्वस्थ होगा, वह उतना ज्यादा खुश होगा और जो जितना खुश होगा, वह उतना ज्यादा स्वस्थ होगा.

2) रिश्ते—सामाजिक संबंध और दूसरों से जुड़ा महसूस करना खुशी को बढ़ाता है.

3) पोषण—स्वस्थ संतुलित आहार स्वस्थ उदर बनाए रखने में मदद करता है और सिद्ध हुआ है कि यह खुशी को बढ़ाता है.

4) शारीरिक व्यायाम—ढेरों प्रमाण बताते हैं कि नियमित शारीरिक व्यायाम से खुशी में इजाफा होता है.

5) ध्यान—प्रमाणों से सिद्ध है कि ध्यान करने से तनाव और दुश्चिंतता कम होती और खुशी बढ़ती है.

6) शरीर की आंतरिक घड़ी की अच्छी लय—स्वस्थ बॉडी क्लॉक व्यक्ति का मिजाज दुरुस्त रखने में मदद करती है. नियमित समय पर सोना और खाना और साथ ही दिन में कुछ देर धूप में बैठना खुशी बढ़ाता है.

7) व्यावहारिक उक्वमीदें—दुनिया के बारे में व्यावहारिक सोच रखना, पर नकारात्मक सोच के फेर में न पडऩा खुशी बढ़ाने में मददगार है.

लोग जिंदगी में जो कुछ भला-चंगा है, उस पर खुश होना सीख सकते हैं, मगर उन्हें अपनी किस्मत सुधारने, अधिकाधिक सुरक्षा हासिल करने और अन्याय से लडऩे के लिए हर वन्न्त काम भी करते रहना होगा
रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर

प्र. खुशी पाने में काम-धंधे और पैसे की कितनी भूमिका रहती है?

➽ निमेश देसाई 
बहुत से लोगों के लिए पैसे और रोजगार-धंधे जैसे मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए एक गलत लेकिन आम धारणा है कि कामकाजी कामयाबी से ही खुशी मिलती है. वास्तव में, हाल के दिनों में कामकाज में सफलता को जीवन में खुश या संतुष्ट होने के साथ इतना अधिक जोड़कर देखा गया है कि उसके कारण कामकाज और जीवन के बीच संतुलन बनाने की बार-बार जरूरत महसूस की जा रही है.

इस दुविधा या द्वंद्ववाद से यह निष्कर्ष निकल सकता है कि काम का जीवन या जीवन में खुशियों से विपरीत रिश्ता है, इसलिए लोगों को काम और जीवन के अन्य पहलुओं के बीच एक अधिक उपयुन्न्त संतुलन बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

हालांकि, खुशी की प्राप्ति में काम-धंधे की भूमिका अभिन्न है, न केवल काम से अर्जित होने वाले धन और प्राप्त सफलता के रूप में, बल्कि काम से जीवन को मिलने वाले एक उद्देश्य और दिमाग को सार्थक रूप से सक्रिय रखने जैसे लाभों के रूप में भी. यहां काम का संदर्भ केवल नौकरी या पेशे से नहीं है, बल्कि उससे अभिप्राय सभी प्रकार के और सभी स्तरों पर किए जाने वाले काम से है, जिसमें एक गृहिणी का काम या फिर जरूरतमंदों की सेवा-टहल भी शामिल है.

दूसरी ओर, पैसे की भूमिका, और क्या यह बुनियादी जरूरतों और भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए आवश्यक है, इस पर बहस हो सकती है लेकिन वर्तमान स्थिति में, आम तौर पर इसको लेकर सहमति दिखेगी. बहस का विषय या मूल मुद्दा यह है कि क्या पैसे को खुशी के लिए केंद्रीय तत्व या आवश्यक माना जाना चाहिए, और किस हद तक? व्यक्ति, परिवार और समुदाय अपने लिए यह खुद तय करता है कि पैसा किस स्तर तक खुशी का केंद्र बिंदु बनेगा. 

 ➽ कमलेश सिंह 
यह तो सच है कि हम सभी को जीवन चलाने के लिए एक निश्चित रकम की आवश्यकता होती है, है न? हालांकि, एक निश्चित बिंदु से आगे, यह जरूरी नहीं है कि पैसा आपकी खुशी को बढ़ाए ही. ऐसा कुछ अध्ययनों से पता चला है. जब बात काम की आती है, तो यह मायने रखता है कि क्या यह आपके लिए सार्थक है और आप इसे करते समय कितना सार्थक अनुभव करते हैं. मनोविज्ञान में ‘फ्लो’ नामक एक अवधारणा है.

यह वह मानसिक अवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति किसी विशेष गतिविधि में पूरी तरह से व्यस्त/तल्लीन हो जाता है. इसमें गहन ध्यान, समय और स्वयं को लेकर जागरूकता की कमी और रचनात्मक जुड़ाव जैसी बातें शामिल हैं. ऐसा पाया गया है कि ‘फ्लो’ का संबंध सुख से है. इसलिए, आप किसी गतिविधि या कार्य के दौरान फ्लो महसूस करते हैं, तो संभावना है कि कार्य से आपकी खुशी का स्तर प्रभावित हो. इसके विपरीत, आपका काम भी आपकी खुशी में बाधा डाल सकता है, खासकर जब वह आपके हुनर और विशेषज्ञता के स्तर के अनुकूल न हो या फिर काम के लिए खराब माहौल हो.

 ➽ रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर 
कुछ लोग इस विचार से असहमत हो सकते हैं कि पैसे से वास्तव में कुछ खुशियां खरीदी जा सकती हैं. पैसा केवल विनिमय का एक साधन है. पैसे के होने से लोग वे काम ज्यादा कर पाते हैं जो उनके लिए बड़े महत्व रखते हैं: दूसरों की मदद करना, शिक्षा प्राप्त करना, छुट्टियां बिताने के लिए जाना या अच्छे भोजन का आनंद लेना. हालांकि, पैसे पर बहुत अधिक जोर देना खुशी के निचले स्तर से जुड़ा है. यह याद रखना उपयोगी है कि पैसा उतना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसका किस प्रकार उपयोग हो रहा है, वह अधिक महत्वपूर्ण है.

 ➽डॉ. श्याम भट 
काम सुखी जीवन का एक महत्वपूर्ण घटक हो सकता है, खासकर अगर वह सार्थक और यथोचित रूप से चुनौतीपूर्ण हो. गरीबी तनाव का कारण बनती है और सुख में कमी लाती है. एक अर्थ में, पैसा खुशी को बढ़ाता है, लेकिन केवल एक निश्चित बिंदु तक. उसके आगे अतिरिक्त धन खुशी के स्तर को प्रभावित नहीं करता है. काम और जीवन की अन्य चीजों के बीच संतुलन आम तौर पर खुशी बढ़ाने में सहायक होता है.

पैसे से यकीनन खुशी बढ़ती है, लेकिन केवल एक हद तक ही, क्योंकि उससे अपने मन की कुछ भौतिक इच्छाएं पूरी कर पाते है. उसके आगे अतिरिक्त धन-संपत्तिम से खुशी शायद ही बढ़ती है 
डॉ. श्याम भट

प्र खुशी या आनंद के पांच मंत्र/सूत्र आप क्या देंगे, और क्यों?

➽ निमेश देसाई 
खुशी का सबसे उपयोगी सूत्र मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और ऐसी परेशानियों में फंसे लोगों का समुचित उपचार करवाना है. दूसरे, असलियत को स्वीकार करें. मसलन, कोविड-19 की असलियत बेशक कठोर और अप्रिय है, फिर भी अनिवार्य यही है कि असलियत को स्वीकार किया जाए. इससे हमें हालात से निपटने, उचित समाधान खोजने और ऐसा कर पाने की अपनी क्षमता को कायम रखने में मदद मिलती है.

तीसरे, नकारात्मक प्रभावों को बेअसर कर दें, क्योंकि वे तनाव और अवसाद जैसे विकारों की वजह बन सकते हैं. चौथे, जिंदगी को अपनी तरह से जीएं. जिंदगी वक्त-वक्त पर जो कुछ देती है, उसका बेहतर से बेहतर इस्तेमाल आपके लचीलेपन की खूबी को बढ़ाता है. आखिरी और उतना ही अहम यह कि अपनी जरूरतें कम करें.

लॉकडाउन और उसके आर्थिक असर न केवल दुश्वारियों बल्कि अभाव और नकारात्कमता की भावना पैदा करती हैं. इससे बचने का एक सार्थक तरीका यह है कि अपनी भौतिक जरूरतें कम करें और सादगीपूर्ण जीवन जीएं. इसके अलावा अपनी ताकत और कमजोरियों के बारे में सचेत रहें.

 ➽ कमलेश सिंह 
सबसे पहले अपने विचारों के प्रति सचेत रहना सीखें. अमूमन आपके विचार आपकी भावनाओं को जन्म देते हैं, यानी खुशी के विचार का मतलब खुशी की भावनाएं. हममें से ज्यादातर का रोज ही तनाव पैदा करने वाली चीजों से साबका पड़ता है. दिमाग को तनावमुक्त करने के लिए हमें ऐसे माहौल से दूर रहकर कुछ वक्त गुजारने की जरूरत होती है. हमें रोज कुछ वक्त ऐसे काम करते हुए गुजारना चाहिए जिनसे सकारात्मक भावनाएं पैदा हों. यह पढ़ना, योग, खेलना, कसरत, नाचना, गाना, पेंटिंग या बागवानी करना हो सकता है.

दुनिया भर में रिसर्च से हमारी खुशी के लिए सकारात्मक रिश्तों की अहमियत का पता चलता है. इसलिए खुशी का मेरा अगला सूत्र अपने को खुश करने के लिए दोस्तों और परिजनों के संपर्क में रहना और इन रिश्तों को खुराक-पानी देना होगा. ‘विपत्ति में किसी पर भरोसा करना’ खुशी की तरफ ले जाता है.

कोशिश करें और अपनी खुशी की चाबी अपने पास रखें और खुद को खुश करने का रोज सायास जतन करें. याद रखें कि छोटे से छोटा उपाय भी अहम है और जरा भी कोशिश नहीं करने से बेहतर है छोटी-सी कोशिश. अपने स्वभाव की ताकत को पहचानना और उसका बेहतर इस्तेमाल करना भी खुशी बढ़ाता है. अपनी दुआओं पर भरोसा करना न भूलें. एक लोकप्रिय तकनीक कृतज्ञता की डायरी रखना है. रोज रात सोने जाने से पहले उसमें तीन चीजें लिख लें जिनके लिए आप एहसानमंद हैं.

 ➽ रॉबर्ट बिस्वास-डायनेर 
कभी-कभार निराश या नकारात्मक महसूस करना स्वाभाविक और स्वीकार्य है. आपके पास जो है, उससे खुश रहें. दूसरों की मदद करें. जिंदगी का आनंद लेने के लिए वक्त निकालें. कुछ ऐसा खोजें जिसे आप बेहतर बना सकते हैं और उस पर काम करें.

 ➽ डॉ. श्याम भट 
पहले एहसानमंद होने और संतोष करना सीखें. हम जिस संसार में रह रहे हैं, वह असंतोष को कई गुना बढ़ाता है. कई लोग अपनी जिंदगी की तुलना अपने दोस्तों या सोशल मीडिया के लोगों से करते हैं. इससे लगातार यह एहसास बना रहता है कि जिंदगी बेहतर हो सकती थी. इसकी काट यह है कि आपके पास जो कुछ है, उसके लिए शुक्रगुजार हों. दूसरे, शारीरिक सेहत अच्छी रखें ताकि मानसिक सेहत अच्छी रहे.

शारीरिक तौर पर स्वस्थ रहेंगे तो दिमाग ज्यादा खुश रहेगा. तीसरे, दूसरों के साथ जुड़े रहें. महामारी ने आधुनिक जिंदगी का अलगाव बढ़ा दिया है. दूसरों के साथ जुड़ना खुशी बढ़ाने का प्रामाणिक तरीका है. चौथे, दूसरों के लिए कुछ करें. दूसरों की मदद पर ध्यान केंद्रित करने से जिंदगी ज्यादा सार्थक और ज्यादा खुश होती है. आखिर में, अपने दिमाग की देखभाल करें. ऐसा करने के लिए ध्यान सीखें. भविष्य की फिक्र या अतीत का मलाल करने के बजाए वर्तमान में जीना खुशी बढ़ाता है. 

‘‘जिंदगी को अपनी तरह से जीएं. जिंदगी वक्त-वक्त पर जो कुछ देती है, उसका बेहतर से बेहतर इस्तेमाल आपके लचीलेपन की खूबी को बढ़ाता है. अपनी जरूरतें यथासंभव कम करें.’’
डॉ. निमेश देसाई.