Hindu Rituals and Science: हिंदू परम्पराओं के आगे विज्ञान भी है नतमस्तक

हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसकी हर परम्परा में वैज्ञानिक तर्क होता है, आइए कुछ ऐसी ही परम्पराओं के बारे में चर्चा करते हैं : हाथ जोड़ कर नमस्ते करना जब हम किसी से मिलते हैं तो हमें हाथ जोड़ कर नमस्ते अथवा नमस्कार करना चाहिए।

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Hindu Rituals and Science: हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसकी हर परम्परा में वैज्ञानिक तर्क होता है, आइए कुछ ऐसी ही परम्पराओं के बारे में चर्चा करते हैं :

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हाथ जोड़ कर नमस्ते करना जब हम किसी से मिलते हैं तो हमें हाथ जोड़ कर नमस्ते अथवा नमस्कार करना चाहिए। 
वैज्ञानिक तर्क : जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक-दूसरे के सम्पर्क में आते और उन पर दबाव पड़ता है तो एक्यूप्रैशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्ति को हम लम्बे समय तक याद रख सकें।

दूसरा तर्क यह है कि हाथ मिलाने (पश्चिमी सभ्यता) की बजाय यदि आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को कोई फ्लू भी है तो भी यह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा। वर्तमान में कोरोना महामारी के दौरान वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए भारतवर्ष की ‘नमस्कार’ करने की पुरातन परम्परा को सारे विश्व ने अपना कर हमारे संस्कारों की महानता को स्वीकृति दी है।    

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एक गोत्र में शादी नहीं करनी चाहिए
वैज्ञानिक तर्क : एक दिन डिस्कवरी चैनल पर जैनेटिक बीमारियों से संबंधित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम था। उस प्रोग्राम में एक अमरीकी वैज्ञानिक ने कहा कि जैनेटिक बीमारी न हो, इसका एक ही इलाज है – ‘सैपेरेशन ऑफ जीन्स’ अर्थात अपने नजदीकी रिश्तेदारी में विवाह नहीं करना चाहिए क्योंकि नजदीकी रिश्तेदारों में जीन्स सैप्रेट (विभाजन) नहीं हो पाते और जीन्स से संबंधित बीमारियां, अनुवांशिक रोग जैसे कलर ब्लाइंडनैस (रंगों में पहचान करने में असमर्थता) हिमोफीलिया (चोट आदि लगने पर बाहर बहते हुए रक्त का प्रवाह का न रुकना), आदि हो सकते हैं।

रक्त का थक्का बनना प्रोटीन की कमी के कारण होता है। ऐसे अन्य कई आनुवांशिक रोगों की शत-प्रतिशत संभावना होती है।

फिर बहुत खुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में दिखाया गया कि ‘हिंदू धर्म’ में आखिर हजारों-हजारों साल पहले जीन्स और डी.एन.ए. के बारे में विस्तृत रूप में लिखा गया है।

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कान छिदवाने की परम्परा

हिंदू धर्म के बच्चों के कान छिदवाने की परम्परा काफी पुराने समय से रही है।
वैज्ञानिक तर्क : दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है जबकि डाक्टरों का मानना है कि इससे स्वर अर्थात आवाज अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस में रक्त संचार नियंत्रित रहता है। इन्हीं कारणों के चलते भारत में कान छिदवाने की परम्परा रही है।

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