Indian Culture Is The Best Culture In The World – भारतीय संस्कृति है विश्व की सर्वोत्तम संस्कृति

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चंदौली के चिरईगांव में चल रहे चातुर्मास के दौरान रविवार को सुंदर राज जी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में लज्जा और मर्यादा को औरतों का गहना माना जाता है। वर्तमान में भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी सभ्यता का बहुत गहरा असर पड़ा है। अपने देश में भी उसकी झलक देखने को मिल रही है। यह गलत है। भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोत्तम संस्कृृति रही है। इन विकारों से बचने के लिए कथा का श्रवण करना चाहिए और अपने बच्चों को भी कथा में लाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अनुकरण के चलते हम अपनी संस्कृति को नजरंदाज करने लगे हैं। परिणाम स्वरूप संस्कृति के प्राण तत्व त्याग, बलिदान, सदाचार, श्रम शीलता के स्थान पर अनुशासनहीनता, आलसीपन और स्वार्थपरता जैसी प्रवृत्तियां पनपने लगी हैं। नई पीढ़ी इनके दुष्प्रभावों के मोह में फंसकर अपने को लुटाने और बरबाद करने में लग गई है। उन्होंने कहा कि नारी के संस्कार,शील व लज्जा से किसी भी देश की सांस्कृतिक पवित्रता बढ़ती है। यदि इसके विपरीत होने लगे तो सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ता है। यह समझ लेने की बात है कि यदि नारी-चरित्र सुरक्षित नहीं रहा तो सृष्टि की सत्ता भी सुरक्षित नहीं रह पायेगी। नारी में ही सृष्टि के बीज निहित हैं।

चंदौली के चिरईगांव में चल रहे चातुर्मास के दौरान रविवार को सुंदर राज जी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में लज्जा और मर्यादा को औरतों का गहना माना जाता है। वर्तमान में भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी सभ्यता का बहुत गहरा असर पड़ा है। अपने देश में भी उसकी झलक देखने को मिल रही है। यह गलत है। भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोत्तम संस्कृृति रही है। इन विकारों से बचने के लिए कथा का श्रवण करना चाहिए और अपने बच्चों को भी कथा में लाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अनुकरण के चलते हम अपनी संस्कृति को नजरंदाज करने लगे हैं। परिणाम स्वरूप संस्कृति के प्राण तत्व त्याग, बलिदान, सदाचार, श्रम शीलता के स्थान पर अनुशासनहीनता, आलसीपन और स्वार्थपरता जैसी प्रवृत्तियां पनपने लगी हैं। नई पीढ़ी इनके दुष्प्रभावों के मोह में फंसकर अपने को लुटाने और बरबाद करने में लग गई है। उन्होंने कहा कि नारी के संस्कार,शील व लज्जा से किसी भी देश की सांस्कृतिक पवित्रता बढ़ती है। यदि इसके विपरीत होने लगे तो सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ता है। यह समझ लेने की बात है कि यदि नारी-चरित्र सुरक्षित नहीं रहा तो सृष्टि की सत्ता भी सुरक्षित नहीं रह पायेगी। नारी में ही सृष्टि के बीज निहित हैं।