Moral Education About Life : Moral Education Related To Human Mind And Heart | आनंद अपने भीतर से ढूंढ़ निकालने की चीज है – Religious Discourse


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निर्मल जैन

मिस्र की एक दंतकथा है। अगर कोई व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश पाना चाहता है तो स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर उसे दो सवालों के जवाब देने होते हैं। पहला सवाल है- क्या जीवन में आपने खुशी और आनंद का अनुभव किया है? और दूसरा सवाल है- क्या आपने अपने आसपास के लोगों को खुशी बांटी है? इन दोनों ही सवालों के लिए आपका जवाब अगर ‘हां’ है तो उसे उत्तर मिलता है कि आप तो पहले से ही स्वर्ग में हैं। अगर जवाब न में होता है तो स्वर्ग के कपाट अपने आप बंद हो जाते हैं।

मनुष्य को तीन प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। बाहर से अनुभव होने वाले दुख और सुख की अनुभूति। तीसरी अनुभूति है उस आनंद की जो भीतर से होती है। सुख, दुख की अनुपस्थिति का नाम है और सुख की अनुपस्थिति में दुख का आभास होता है। जबकि आनंद की अनुभूति सुख और दुख दोनों की अनुपस्थिति है। आनंद की स्थिति मन की ऐसी स्थिति है जो बाहर से घटित होने वाली किसी भी घटना से प्रभावित नहीं होती। आज के दौर में जब क्रोध, नफरत और असहनशीलता भयानक तौर से लोगों के सिर चढ़कर बोल रही है, ऐसे में आनंद लुटाता इंसान ही सबसे बड़ी राहत के रूप में नजर आता है। जो लोग आनंदमय होने का महत्व जानते हैं, वही हर तरफ आनंद का माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। हम किस तरह आनंदित होते हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जरूरी यह है किसी भी तरह आनंद अनुभव करें। सामान्य रूप से आनंद की एक परिभाषा हम समझते हैं कि जो अच्छा लगा उसमें हमें आनंद आया और जो बुरा लगा उसमें आनंद नहीं आया। लेकिन वास्तविक जो आनंद है उसमें अच्छे-बुरे का सवाल नहीं।

किसी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर रहने वाला सुख कभी भी स्थायी नहीं हो सकता। किसी के पास कितना भी हो हमेशा कम ही पड़ता है। लेकिन आनंदित होने का अर्थ किसी भी चीज पर निर्भरता नहीं है। यह तो हमारी अपनी प्रकृति है। आनंद को असल में किसी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती। वह अपने भीतर गहराई में खोद कर ढूंढ निकालने की चीज है। छोटी-छोटी बातों में आनंद खोजना चाहिए क्योंकि बड़ी-बड़ी बातें तो जीवन में कुछ ही होती हैं। मनुष्य का स्थायी आनंद किसी वस्तु के ग्रहण करने में नहीं, बल्कि अपने को उसके प्रति समर्पित करने में है।

भोगते हम सुख और दुख दोनों को हैं। सुख हम भोगते हैं भोग-भोग कर और दुख भोगते हैं भाग-भाग कर। आनंद का सूत्र एक ही है- ना ‘सुख’ को भोगने की अकांक्षा, ना ‘दुख’ से भागने का आवेग। कल राज्याभिषेक होगा। मैं राजा बनूंगा इस पर भी सुखी नहीं, मुझे वनवास जाना होगा, राजपाट छोड़ना होगा यह जान कर भी दुखी नहीं। ऐसा होना होता है राम होना। राम होना, यानी सुख-दुख से दूर होना ही आनंद का पर्याय है।

व्यक्ति जितना सरल और साधारण होगा, वह उतना ही आनंद से परिपूर्ण होगा। आनंद के स्रोत प्राकृतिक सौंदर्य के साथ अपने हृदय को एकाकार करना, प्रकृति की भाषा समझने का प्रयास करना कष्ट-साध्य लगता अवश्य है पर जिसने सरलता को साध लिया, उसके लिए कठिन दिखने वाला यह कार्य बड़ा आसान बन जाता है। एक बार इस दिशा में कदम बढ़ना शुरू हो गए, फिर तो आनंद ही आनंद है।